राग मालगुंजी

स्वर लिपि

स्वर आरोह में पंचम वर्ज्य। निषाद कोमल, गंधार दोनों। शेष शुद्ध स्वर।
जाति षाढव - सम्पूर्ण वक्र
थाट काफी
वादी/संवादी मध्यम/षड्ज
समय रात्रि का तीसरा प्रहर
विश्रांति स्थान म; सा;
मुख्य अंग ग म ग१ रे सा ; ,नि१ सा ; ,ध ,नि१ सा रे ग म ;
आरोह-अवरोह सा रे ग म ध नि१ सा' - सा' नि१ ध प म ; ग१ रे ; ग प म ; ग१ रे ग म ; ग१ रे सा ;

विशेष - यह बहुत ही मीठा राग है। यह बागेश्री से मिलता जुलता राग है। आरोह में शुद्ध गंधार लगाने से यह राग बागेश्री से अलग होता है। इसमें आरोह में शुद्ध गंधार और अवरोह में कोमल गंधार का प्रयोग किया जाता है।